गोवर्धन की उत्पत्ति :
गर्ग संहिता में श्री वृन्दाबन खंड के द्वितीय अध्याय में श्री राधारानी कहती हैं --जहाँ वृन्दाबन नहीं है ,जहाँ यमुना नहीं है ,तथा जहाँ गोवर्धन पर्वत नहीं है ,वहां मेरे मन को सुख नहीं मिल सकता ।श्री राधारानी की यह बात सुनकर स्वयं श्रीहरि ने अपने दिव्य गोलोक धाम से चौरासी कोस वृज मंडल ,गोवर्धन पर्वत और यमुना नदी को भूतल पर भेजा ।गोवर्धन पर्वत ने भारत वर्ष से पश्चिम दिशा में शाल्मली द्वीप के भीतर द्रोणाचल की पत्नी के गर्भ से जन्म ग्रहण किया ।
पुलस्त ऋषी के मन में उस पर्वत को प्राप्त करने की इच्छा हुयी और उन्होंने द्रोणाचल से निवेदन किया --"मै काशी का निवासी हूँ और तुम्हारे निकट तुम्हारे पुत्र गोवेर्धन को याचक बनकर लेने आया हूँ ।मै उसके ऊपर रहकर तपस्या करूंगा ।"
द्रोणाचल ने शाप के भय से निवेदन स्वीकार कर लिया और गोवर्धन को चलने को कह दिया ।गोवर्धन ने कहा --मेरा शरीर आठ योजन लंबा ,दो योजन उंचा और 5 योजन चौड़ा है ।आप मुझे ले जाते समय जहाँ पर रख देंगे मै वहीँ पर स्थापित हो जाउंगा ।चलते -चलते जब वृज मंडल आया तो गोवर्धन ने मन ही मन सोचा --यहाँ वृज में असंख्य ब्रह्माण्ड नायक साक्षात भगवान्
श्री कृष्ण अवतार लेंगे और ग्वालबालों के साथ बाल लीला करेंगे ।अतः मुझे यहाँ से अन्यत्र नहीं जाना चाहिए ।मन -ही मन ऐसा सोचकर गोवर्धन ने मुनि की हथेली पर अपना शरीर का भार अधिक बढ़ा लिया ।उस समय मुनि थक गए और गोवर्धन को नीचे रख दिया ।पुलस्त जी ने भरपूर जोर लगाया किन्तु अब गोवर्धन टस से मस न हुआ , इस पर ऋषि ने गोवर्धन को शाप दिया ।तू प्रतिदिन तिल -तिलभर क्षीण होता चला जाएगा ।सन्नन्द जी कहते हैं --जबतक भागीरथी गंगा और गोवर्धन पर्वत इस भूतल पर विद्यमान है ,तब तक कलि का प्रभाव नहीं बढ़ेगा ।
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गोवर्धन परिक्रमा कैसे करें :
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श्री मद भागवत महापुराण में श्रीकृष्ण का आदेश है --
स्वलंक्रता भुक्त वन्तः स्वनुलिप्ता: सुवाससः ।
प्रदक्षिणं च कुरुत गोविप्रानलपर्वतान ।।(भागवत 10/24/29)
सुन्दर -सुन्दर वस्त्रादि पहनकर गौ ,ब्राह्मण ,अग्नि तथा गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा की जाय ।
यवसं च गवां दत्वा गिरये दीयतां बलिः ।(भागवत 10/24/28)
श्रीकृष्ण का आदेश है गायों को चारा दिया जाये फिर गिरिराज को भोग लगाया जाये ।अर्थात सर्वप्रथम दानघाटी पर या मुखारविंद पर गिरिराज जी को भोग लगाकर दुग्धा भिशेख किया जाये ।ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते हुए गिरिराज की आरती की जाये और तब नाम संकीर्तन करते हुए गिरिराज की परिक्रमा की जाये ।
जब तक गिरिराज में आकर गाय को चारा न खिलाया जाये , ब्राह्मणों की पूजा न की जाये और ज्योति न जलाया जाये तब तक परिक्रमा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता ।।
गर्ग संहिता में श्री वृन्दाबन खंड के द्वितीय अध्याय में श्री राधारानी कहती हैं --जहाँ वृन्दाबन नहीं है ,जहाँ यमुना नहीं है ,तथा जहाँ गोवर्धन पर्वत नहीं है ,वहां मेरे मन को सुख नहीं मिल सकता ।श्री राधारानी की यह बात सुनकर स्वयं श्रीहरि ने अपने दिव्य गोलोक धाम से चौरासी कोस वृज मंडल ,गोवर्धन पर्वत और यमुना नदी को भूतल पर भेजा ।गोवर्धन पर्वत ने भारत वर्ष से पश्चिम दिशा में शाल्मली द्वीप के भीतर द्रोणाचल की पत्नी के गर्भ से जन्म ग्रहण किया ।
पुलस्त ऋषी के मन में उस पर्वत को प्राप्त करने की इच्छा हुयी और उन्होंने द्रोणाचल से निवेदन किया --"मै काशी का निवासी हूँ और तुम्हारे निकट तुम्हारे पुत्र गोवेर्धन को याचक बनकर लेने आया हूँ ।मै उसके ऊपर रहकर तपस्या करूंगा ।"
द्रोणाचल ने शाप के भय से निवेदन स्वीकार कर लिया और गोवर्धन को चलने को कह दिया ।गोवर्धन ने कहा --मेरा शरीर आठ योजन लंबा ,दो योजन उंचा और 5 योजन चौड़ा है ।आप मुझे ले जाते समय जहाँ पर रख देंगे मै वहीँ पर स्थापित हो जाउंगा ।चलते -चलते जब वृज मंडल आया तो गोवर्धन ने मन ही मन सोचा --यहाँ वृज में असंख्य ब्रह्माण्ड नायक साक्षात भगवान्
श्री कृष्ण अवतार लेंगे और ग्वालबालों के साथ बाल लीला करेंगे ।अतः मुझे यहाँ से अन्यत्र नहीं जाना चाहिए ।मन -ही मन ऐसा सोचकर गोवर्धन ने मुनि की हथेली पर अपना शरीर का भार अधिक बढ़ा लिया ।उस समय मुनि थक गए और गोवर्धन को नीचे रख दिया ।पुलस्त जी ने भरपूर जोर लगाया किन्तु अब गोवर्धन टस से मस न हुआ , इस पर ऋषि ने गोवर्धन को शाप दिया ।तू प्रतिदिन तिल -तिलभर क्षीण होता चला जाएगा ।सन्नन्द जी कहते हैं --जबतक भागीरथी गंगा और गोवर्धन पर्वत इस भूतल पर विद्यमान है ,तब तक कलि का प्रभाव नहीं बढ़ेगा ।
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गोवर्धन परिक्रमा कैसे करें :
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श्री मद भागवत महापुराण में श्रीकृष्ण का आदेश है --
स्वलंक्रता भुक्त वन्तः स्वनुलिप्ता: सुवाससः ।
प्रदक्षिणं च कुरुत गोविप्रानलपर्वतान ।।(भागवत 10/24/29)
सुन्दर -सुन्दर वस्त्रादि पहनकर गौ ,ब्राह्मण ,अग्नि तथा गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा की जाय ।
यवसं च गवां दत्वा गिरये दीयतां बलिः ।(भागवत 10/24/28)
श्रीकृष्ण का आदेश है गायों को चारा दिया जाये फिर गिरिराज को भोग लगाया जाये ।अर्थात सर्वप्रथम दानघाटी पर या मुखारविंद पर गिरिराज जी को भोग लगाकर दुग्धा भिशेख किया जाये ।ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते हुए गिरिराज की आरती की जाये और तब नाम संकीर्तन करते हुए गिरिराज की परिक्रमा की जाये ।
जब तक गिरिराज में आकर गाय को चारा न खिलाया जाये , ब्राह्मणों की पूजा न की जाये और ज्योति न जलाया जाये तब तक परिक्रमा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता ।।
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