प्रश्न
: भगवान् ,भगवान् क्यों हैं ?क्या जीव भी भगवान् बन सकता है ?कान्ति भाई पटेल हौस्पेट , कर्नाटक ।
उत्तर :
आपका जबाब मानस की इन चौपाईयों में निहित है :--
तपबल ते जग सृजई बिधाता ।तपबल बिष्णु भये परित्राता ।।
तप अधार सब सृष्टि भवानी । करहि जाई तप अस जिंय जानी ।।
अर्थात तप बल के द्वारा ही भगवान् विष्णु सृष्टि का पालन करते हैं ,ब्रह्मा रचते हैं और भगवान् शंकर संहार करते हैं ।सृष्टि का आधार ही तप है ।कठोर तप के द्वारा माता पार्वती ने शिव को पति रूप में पाया ।किन्तु कलियुगी प्राणी देहाभिमानी होने के कारण भगवान् तो दूर एक साधारण मानव भी नहीं बन पाता ।श्रीमद भागवत में भगवान स्वयं उद्धव से कहते हैं --दुर्जनों के बचनों को सुनकर भी शांत रहना अति दुर्लभ है ।जो ऐसे पुरुषों के बचन सुनकर भी शांत रहते हैं ,शांति से उनको समझाते हैं ,एवं उनसे बदले की भावना नहीं रखते ऐसे पुरुष ईश्वर कहलाते हैं ।
बार्हस्पत्य स नास्त्यत्र साधुर्वै दुर्जने रीतै:।
दुरुक्तै भिर्न्न्मात्मानाम यः समाधातुमीश्वर:।।(भागवत 11/23/2)
जो भक्त निजी अपमान सहन करते हुए भी परोपकार में संलग्न रहते हैं और प्रत्येक कार्य में कर्तृत्व अभिमान से मुक्त रहते हैं ,सदा भगवान् ही कहलाते हैं ।शेष भगवत कृपा ।पं चन्द्र सागर
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