Tuesday, 23 July 2013

desh ka mudda: गोवर्धन की उत्पत्ति :

Bhagwat Bhakti Sandesh: गोवर्धन की उत्पत्ति :: गोवर्धन की उत्पत्ति : गर्ग संहिता में श्री वृन्दाबन खंड के द्वितीय अध्याय में श्री राधारानी कहती हैं --जहाँ वृन्दाबन नहीं है ,जहाँ यमुना न...

कौन है धर्म निरपेक्ष !!?

मै पृथ्वी के सापेक्ष हूँ ,अग्नि और जल के भी सापेक्ष हूँ, मै एक पल भी इनसे निरपेक्ष नहीं रह सकता । वायु के बिना तो अधिकतम 30 सेकण्ड ही रह सकता हूँ अर्थात सबसे ज्यादा सापेक्ष तो वायु का । इसीप्रकार अपने परिवार के सभी रिश्तों के सापेक्ष हूँ ,मै  अपनी माँ ,बहन ,बेटी अथवा मित्रों से भी निरपेक्ष नहीं रह सकता ,मेरे जीवन में इन सबकी बहुत आवश्यकता है ।इसीप्रकार जो सदगुणों को धारण करना सिखाये ,  दया ,करुणा ,प्राणिमात्र के प्रति प्रेम -भावना को सिखाने वाला "धर्म" से निरपेक्ष कैसे रहूँ ?कोई उसे मानव धर्म कहता है ,कोई वैदिक धर्म तो कोई हिन्दू धर्म ! जन्म से ही जिस धरती ने हमें पाल-पोसकर बड़ा किया उसी राष्ट्र से निरपेक्ष कैसे रहूँ? ,अतः मै "राष्ट्रवादी "हूँ ,हिन्दू हूँ, इन शब्दों को कहने में आज भारत का नेता भले ही मजबूर हो किन्तु आप नहीं ।एक सच्चा भारतीय भेद-भाव और ऊँचनीच की भावना से ऊपर उठकर इस राष्ट्र को लुटेरों के हाथो से अवश्य बचाए !जय हिंद ! जय भारत ! जय भारत वासी !! 

Thursday, 28 March 2013

गोवर्धन की उत्पत्ति :

गोवर्धन की उत्पत्ति :
गर्ग संहिता में श्री वृन्दाबन खंड के द्वितीय अध्याय में श्री राधारानी कहती हैं --जहाँ वृन्दाबन नहीं है ,जहाँ यमुना नहीं है ,तथा जहाँ गोवर्धन पर्वत नहीं है ,वहां मेरे मन को सुख नहीं मिल सकता ।श्री राधारानी की यह बात सुनकर स्वयं श्रीहरि ने अपने दिव्य गोलोक धाम से चौरासी कोस वृज मंडल ,गोवर्धन पर्वत और यमुना नदी को भूतल पर भेजा ।गोवर्धन पर्वत ने भारत वर्ष से पश्चिम दिशा में शाल्मली द्वीप के भीतर द्रोणाचल की पत्नी के गर्भ से जन्म ग्रहण किया ।
पुलस्त ऋषी के मन में उस पर्वत को प्राप्त करने की इच्छा हुयी और उन्होंने द्रोणाचल से निवेदन किया --"मै काशी का निवासी हूँ और तुम्हारे निकट तुम्हारे पुत्र गोवेर्धन को याचक बनकर लेने आया हूँ ।मै उसके ऊपर रहकर तपस्या करूंगा ।"
द्रोणाचल ने शाप के भय से निवेदन स्वीकार कर लिया और गोवर्धन को चलने को कह दिया ।गोवर्धन ने कहा --मेरा शरीर आठ योजन लंबा ,दो योजन उंचा और 5 योजन चौड़ा है ।आप मुझे ले जाते समय जहाँ पर रख देंगे मै वहीँ पर स्थापित हो जाउंगा ।चलते -चलते जब वृज मंडल आया तो गोवर्धन ने मन ही मन सोचा --यहाँ वृज में असंख्य ब्रह्माण्ड नायक साक्षात भगवान्
श्री कृष्ण अवतार लेंगे और ग्वालबालों के साथ बाल लीला करेंगे ।अतः मुझे यहाँ से अन्यत्र नहीं जाना चाहिए ।मन -ही मन ऐसा सोचकर गोवर्धन ने मुनि की हथेली पर अपना शरीर का भार अधिक बढ़ा लिया ।उस समय मुनि थक गए और गोवर्धन को नीचे रख दिया ।पुलस्त जी ने भरपूर जोर लगाया किन्तु अब गोवर्धन टस से मस न हुआ , इस पर ऋषि ने गोवर्धन को शाप दिया ।तू प्रतिदिन तिल -तिलभर क्षीण होता चला जाएगा ।सन्नन्द जी कहते हैं --जबतक भागीरथी गंगा और गोवर्धन पर्वत इस भूतल पर विद्यमान है ,तब तक कलि का प्रभाव नहीं बढ़ेगा ।
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गोवर्धन परिक्रमा कैसे करें :
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श्री मद भागवत महापुराण में श्रीकृष्ण का आदेश है --
स्वलंक्रता भुक्त वन्तः स्वनुलिप्ता: सुवाससः ।
प्रदक्षिणं च कुरुत गोविप्रानलपर्वतान ।।(भागवत 10/24/29)
सुन्दर -सुन्दर वस्त्रादि पहनकर गौ ,ब्राह्मण ,अग्नि तथा गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा की जाय ।
यवसं च गवां दत्वा गिरये दीयतां बलिः ।(भागवत 10/24/28)
श्रीकृष्ण का आदेश है गायों को चारा दिया जाये फिर गिरिराज को भोग लगाया जाये ।अर्थात सर्वप्रथम दानघाटी पर या मुखारविंद पर गिरिराज जी को भोग लगाकर दुग्धा भिशेख किया जाये ।ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते हुए गिरिराज की आरती की जाये और तब नाम संकीर्तन करते हुए गिरिराज की परिक्रमा की जाये ।
जब तक गिरिराज में आकर गाय को चारा न खिलाया जाये , ब्राह्मणों की पूजा न की जाये और ज्योति न जलाया जाये तब तक परिक्रमा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता ।।

Wednesday, 27 March 2013

भगवान् कौन ?


प्रश्न : भगवान् ,भगवान् क्यों हैं ?क्या जीव भी भगवान् बन सकता है ?कान्ति भाई पटेल हौस्पेट , कर्नाटक

उत्तर : आपका जबाब मानस की इन चौपाईयों में निहित है :--

तपबल ते जग सृजई बिधाता ।तपबल बिष्णु भये परित्राता ।।

तप अधार सब सृष्टि भवानी करहि जाई तप अस जिंय जानी ।।

अर्थात तप बल के द्वारा ही भगवान् विष्णु सृष्टि का पालन करते हैं ,ब्रह्मा रचते हैं और भगवान् शंकर संहार करते हैं ।सृष्टि का आधार ही तप है ।कठोर तप के द्वारा माता पार्वती ने शिव को पति रूप में पाया ।किन्तु कलियुगी प्राणी देहाभिमानी होने के कारण भगवान् तो दूर एक साधारण मानव भी नहीं बन पाता ।श्रीमद भागवत में भगवान स्वयं उद्धव से कहते हैं --दुर्जनों के बचनों को सुनकर भी शांत रहना अति दुर्लभ है ।जो ऐसे पुरुषों के बचन सुनकर भी शांत रहते हैं ,शांति से उनको समझाते हैं ,एवं उनसे बदले की भावना नहीं रखते ऐसे पुरुष ईश्वर कहलाते हैं

बार्हस्पत्य नास्त्यत्र साधुर्वै दुर्जने रीतै:

दुरुक्तै भिर्न्न्मात्मानाम यः समाधातुमीश्वर:।।(भागवत 11/23/2)

जो भक्त निजी अपमान सहन करते हुए भी परोपकार में संलग्न रहते हैं और प्रत्येक कार्य में कर्तृत्व अभिमान से मुक्त रहते हैं ,सदा भगवान् ही कहलाते हैं ।शेष भगवत कृपा ।पं चन्द्र सागर